सत्य में पक्षपात कैसा?

हिन्दू की बात हो, ना कोई मुसलमान की
अब तो हर इक बात हो बस ईमान की

हिन्दू-मुसलिम की जगह सत्य की तरफदारी होनी चाहिए। अक्सर लोग ऐसा करते भी हैं, मगर कुछ लोगो को छोड़कर। जिनके लिए सही-गलत को देखने का चश्मा धार्मिक अथवा जातीय भेदभाव से प्रभावित होकर गुज़रता है। कुछ अज्ञानतावश ऐसा करते हैं तो कुछ राजनैतिक दुष्प्रचार के कारण पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर।

इस हालात से तभी निजात पाई जा सकती है, जबकि देश को धर्मों-जातियों में बाटने की राजनीति का देश से खात्मा कर दिया जाए!

 
हम शौक़ से हिन्दू या मुसलमान बनें
कुछ भी बन जाएँ मगर पहले इक इंसान बनें।

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रावण-दहन ना देख पाने की मायूसी


बेटियां बहुत नाराज़ थी! बड़ी बिटिया 'ऐना' बोली कि आप अच्छे नहीं हैं, आपने promise किया था और break कर दिया!

कल दोनों बेटियों को रावण दहन दिखाने ले कर गया था, मगर कल बहुत ही व्यवस्थित कार्यक्रम था। इस बार खाली मैदान के आगे बैठने का इंतजाम किया गया था, जिसको बड़े से पांडाल से कवर किया गया था। मगर उसमें अन्दर जाने के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी थी।

हालाँकि पीछे से वीआईपी पास से जाने का इंतजाम था, मगर मुझे वहां से अन्दर जाना घंटों से लाइन में लगी इतनी भारी भीड़ के साथ अन्याय लगा। इसलिए मैं बाहर से ही बेटियों को किसी तरह समझा-बुझा कर वापिस ले आया... मगर उनका सारा उत्साह मायूसी में तब्दील हो गया!

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नेताओं की नकली धर्मनिरपेक्षता

नकली धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर 'धर्मनिरपेक्षता' को बदनाम करने वाली पार्टियाँ चाहे जितना मर्ज़ी धार्मिक भेदभाव फैलाएं, वोटों के लिए दंगों की साजिशों में शामिल रहें, इनकी छवि धर्मनिरपेक्ष ही रहने वाली है। 

हमारे बौद्धिक विकास के स्तर का इसी से अंदाज़ा लग जाता है। आज भी हम बड़े दुश्मन से निपटने के लिए छोटे दुश्मन का सहारा लेने वाली सोच के ग़ुलाम हैं

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हुक़्म नहीं है 'फतवा'

'फतवा' केवल सवाल करने पर ही दिया जाता है और मालूम करने वाले व्यक्ति के लिए ही होता है। ज़रूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सही हो। क्योंकि फतवा विशेष परिस्थिति के अनुसार इस्लामिक उसूलों की रौशनी में दी गयी 'सलाह' या 'मार्गदर्शन' का नाम है। तथा सम्बंधित व्यक्ति उसका पालन अथवा नज़रअंदाज़ कर सकता है। यहाँ तक कि एक ही परिस्थिति पर अलग-अलग राय के अनुसार 'फतवा' भी अलग-अलग हो सकता है।

किसी भी 'फतवे' की व्याख्या के लिए मालूम किये गए प्रश्न और परिस्थितियों का गहरा अध्यन आवश्यक होता है।

अक्सर 'फतवा' को 'हुक्म' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। हालाँकि जानकारी के अभाव में अक्सर लोग फतवे को हुक्म ही समझते हैं।



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क्योंकि मानसिक विक्षिप्त वोटर नहीं हैं


क्या विकास का फटा ढोल बजाने वाली सरकारों के पास सड़कों पर दर-बदर की ठोकरे खाने वाले मानसिक विक्षिप्त लोगो के लिए कोई प्लान नहीं है? उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है? उनकी मदद के लिए कोई बजट नहीं? या कोई ऐसा बिल जो मंत्रिमंडल समूह ने अप्रूव कर दिया हो या लोकसभा/राज्यसभा में हो? 

कुछ मानवीय संवेदनाएं बची हैं या बस वोटरों को ही लुभाया जाएगा? 

नहीं, बस यूँ ही मालूम कर लिया... सुना है आजकल 'भारत निर्माण' हो रहा है..

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चुनावी मौसम में मासूमों की बलि

सेनाएँ तैयार हो चुकी हैं, सेनापति ताल ठोक रहे हैं... मासूम जनता की बलि चढ़ाई जा रही है... देश की फिज़ा को बदबूदार बनाए जाने की कोशिशें रंग ला रही हैं। पिद्दी से पिद्दी पार्टी का नेता भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है... आखिर यह इलेक्शन होते ही क्यों हैं???

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वोटों के लालची इंसानियत की लाश के चीथड़े उड़ा रहे हैं


कुछ को लग रहा है मुसलमान मारे जा रहे हैं और कुछ को लग रहा है हिन्दू... किसी का भाई दंगो का शिकार हुआ है किसी का बेटा और किसी बाप... कितनी ही औरतों की आबरू को कुचल दिया गया... मगर हर इक अपने-अपनों के गम में उबल रहा है और दूसरों की मौत पर अट्टहास कर रहा है... घिन आती है इस सोच पर!

यक़ीन मानिये इन देशद्रोही नेताओं के हाथों इंसानियत को सरे-आम क़त्ल किया जा चुका है और अब रोज़-बरोज़ इंसानियत की मृत देह चीथड़े-चीथड़े की जा रही हैं।

ख़ुदा खैर करे!!! देश में इलेक्शन आने वाला है।

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कहानी हर घर की...

सास चाहती है बहु उसके 'हिसाब' से चले और बहु चाहती है कि सास उसके 'हिसाब' से!

वहीँ पिता चाहता है बेटा उसके 'हिसाब' से चलना चाहिए, मगर बेटे का 'हिसाब' कुछ दूसरा ही होता है। उधर पति चाहता है कि पत्नी पर उसका 'हिसाब' चले मगर पत्नी अपना 'हिसाब' चलाना चाहती है।

आखिर दूसरों पर अपनी सोच थोपने की जगह सब अपने-अपने 'हिसाब' से क्यों नहीं चलते?


वैसे मज़े की बात यह है कि जो दूसरों को अपने 'हिसाब' से चलाना चाहते हैं, वह खुद भी उस 'हिसाब' से नहीं चलते!!!



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Juvenile Act बदलने के लिए आन्दोलन की आवश्यकता


दामिनी कांड के तथाकथित नाबालिग अभियुक्त को जो सज़ा हुई है, वोह कानून के मुताबिक तो एकदम ठीक हई है, मगर न्याय के एतबार से इस सज़ा को नहीं के बराबर ही कहा जाएगा। मुझे लगता है ध्यान और कोशिश इस सज़ा से भी अधिक ऐसे कानून को बदलने पर होनी चाहिए जिसके तहत रेप विक्टिम को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया। Juvenile Act को बदलने के लिए एक  बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है।

समय रहते चेतना होगा, ना केवल बलात्कार जैसे घृणित कृत बल्कि आतंकवाद जैसे समाज के लिए खतरनाक अपराधों में भी इस तरह के कानूनों के दुरूपयोग की पूरी संभावनाएं हैं। 

ज़रा सोचिए अगर कसाब 17 वर्ष का होता तो क्या होता???

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पश्चिम जगत अब उन्ही आतंकवादियो का समर्थक क्यों है?


जिन आतंकवादी संगठनों की हरक़तों के कारण पश्चिम जगत दुनिया के सारे मुसलमानों को आतंकवादी ठहराने पर तुला हुआ था, आज वही संगठन उनके लिए सीरिया में मुजाहिदीन हो गए? अब उन पर ड्रोन हमले नहीं बल्कि हथियार पहुंचाएं जा रहे हैं... आम फौजियों की तरह सैलिरी, हथियार और अन्य सुविधा मुहैय्या करवाई जा रही हैं?

और जब सारे हित साध लिए जाएँगे तो फिर से उनकी नज़र में सारे मुसलमान आतंकवादी हो जाएँ।

बंदर लडवा रहें हैं और बिल्लियाँ लड़ रही हैं और दूर बैठी बाकी बिल्लियाँ अपनी-अपनी पसंद की बिल्लीयोँ का समर्थन कर रहीं है।

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