शुक्रगुज़ार बंदा क्यों ना बनूँ?

ऐ मेरे रब, उन ने'एमतों के लिए भी बहुत-बहुत शुकिया, जिनको हम कभी महसूस भी नहीं कर पाते!

हमारा रब हमें रात-दिन अनेक खुशियाँ अता करता है, मगर उनसे खुश होना और शुक्रगुज़ार बनना तो दूर, अक्सर को तो हम खुशियों में शुमार भी नहीं करते हैं।


बच्चों के घर वापिस आने के ख़ुशी की अहमियत उनसे मालूम करो जिनका बच्चा सही सलामत स्कूल गया था, मगर वापिस नहीं आया... 

पेशाब आने की क़द्र उससे मालूम करिए जिसका पेशाब आना बंद हो, या फिर मुंह में थूक बनने की ख़ुशी उससे मालूम करिए जिसके मुंह में लार बनना बंद हो गई हो।

इस तरह की एक छोटी सी ख़ुशी को प्राप्त करने के लिए वह अपना सबकुछ लुटा देने को तैयार हो जाएँगे!






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एक-दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखना हमारा फ़र्ज़ है

हम इक ऐसे समाज में रहते हैं जहां विभिन्न सोच और आस्था को मानने वाले एक साथ रहते हैं और फिर यह इंसानियत का तकाज़ा भी है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखें
!

यह इसलिए भी ज़रूरी है कि अलग-अलग तरह के माहौल में पलने-बढ़ने के कारण हमें एक-दूसरे की मान्यताओं की समझ नहीं होती और इसी वजह से हम अक्सर दूसरों की सोच को अपने चश्में से देखने की कोशिश करते हैं।

यही कारण है कि हमें दूसरों की सोच हास्यपद / क्रूर / बेवकूफी लगती है और हम एक-दूसरे की भावनाओं का मज़ाक उड़ाने लगते हैं। यहाँ तक कि एक-दूसरे को अपशब्द कहने से भी गुरेज़ नहीं करते।

जबकि ऐसी ही स्थिति के लिए अल्लाह कुरआन में फरमाता है:

कह दीजिए "ऐ इंकार करने वालों, मैं वैसी बंदगी नहीं करूँगा जैसी तुम करते हो।
ना ही तुम वैसी बंदगी करने वाले हो जैसी मैं करता हूँ।
और ना मैं वैसी बंदगी करने वाला हूँ जैसी तुमने की है।
और ना तुम ऐसी बंदगी करने वाले हो जैसी मैं करता हूँ।

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म।
(कुरआन 109: 1-6)






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पत्रकारिता और उसका विरोध

पत्रकार कोई क्रन्तिकारी नहीं होता और ना ही उनका काम जनता की राय बनाना होता है बल्कि पत्रकारिता का मक़सद केवल जनता की राय को सामने लाना और इसी तरह किसी घटना के पीछे छुपे सच को बाहर लाना होना चाहिए।


हालाँकि इस कवायद में अक्सर तीखे सवाल किये जाते हैं, जिसमें से  बहुत सी बातें हमें पसंद आ सकती हैं और बहुत सी नापसंद। ऐसे में एक अच्छे लीडर का काम है विचलित हुए बिना धैर्य और चतुराई से जवाब देना। 

जहाँ तक आम आदमी की बात है तो उनसे केवल सम्बंधित विषय पर राय ही मांगी जा सकती है। ऐसे में किसी नेता या उसके समर्थकों के द्वारा पत्रकार की अभिव्यक्ति पर विचलित होना, गुस्सा दिखाना, साक्षात्कार को बीच में छोड़ देना या फिर कानून को अपने हाथ में लेने जैसे कृत निंदनीय हैं।

ऐसे कृत फासिस्ट मानसिकता को दर्शाते हैं, क्योंकि फ़सिज्म की पहचान ही यही है कि इसमें अपने खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज़ को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाता।





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जयललिता पर कोर्ट का फैसला गुनाहगार नेताओं के खिलाफ फिर से उम्मीद जगा रहा है

कुछ नेता गुनाहगार होने के बावजूद जनता को मानसिक गुलाम बनाकर चुनाव जीत जाते हैं और देश के सर्वोच्य पदों तक पहुँच जाते हैं... फिर उसपर सोचते हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा, हालाँकि हमारे देश में इनका अबतक कुछ बिगड़ता भी नहीं था।


मगर कुछ दिनों से नेताओं पर आए कोर्ट के फैसले इंसाफ की उम्मीद जगा रहे हैं, जयललिता पर आया फैसला भी इसी की एक कड़ी है! अगर देश के लोग जागरूक हो जाएं तो बाकी बचे अपराधी भी अपनी सही जगह पहुँच जाएं!





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क्या पीएम की आगवानी के लिए एक भी अमेरिकी प्रतिनिधि का ना होना देश का अपमान नहीं है?

क्या यह देश का अपमान नहीं कि हमारे देश का प्रधानमंत्री अमेरिकी यात्रा पर पहुंचे तो आगवानी के लिए वहां का कोई छोटे से छोटा मंत्री भी नहीं पहुंचे, यहाँ तक कि किसी को आगवानी के लिए ऑफिशियली अपोइंट भी ना किया जाए? हमारी एम्बेसी को उन्हें रिसीव करना पड़े!


यह हाल तब है जबकि उनका वर्तमान तो क्या अगर भूतपूर्व राष्ट्राध्यक्ष भी हमारे यहाँ आता है तो हम अपनी पलकें तक बिछा देते हैं! मेहमान नवाज़ी में कोई कसर नहीं छोड़ते।

कुछ लोगो का विचार है कि वोह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने गए हैं, अमेरिकी यात्रा पर नहीं। अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या अमेरिका की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? हमारे देश में सार्क देशों के सम्मलेन में आने वाले प्रतिनिधियों का भी हम ऐसे ही स्वागत करते हैं जैसे बाकी समय आए किसी प्रतिनिधि का। 

मैं बात-बात में अमेरिका की रट लगाने वालों से पूछना चाहता हूँ कि यह किस तरह का आचरण है कि कोई राष्ट्राध्यक्ष उनके देश में पधारे तो उसकी आगवानी भी ना की जाए? 

हमारे देश की विश्व में एक अहमियत है और देश का प्रधानमंत्री कोई एक व्यक्ति भर नहीं बल्कि 122 करोड़ लोगो का प्रतिनिधि होता है। फिर चाहे वह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने के लिए ही अमेरिका क्यों ना गए हों तब भी देश के प्रधानमंत्री को कम से कम इतना सम्मान तो मिलना ही चाहिए!





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चिड़ियाघर जैसे हादसे और जवाबदेही

एक नौजवान, शेर से अपनी जान की भीख मांगता रहा, बेहिस लोग वीडियो बनाने में मशगूल थे और सिक्योरिटी सोती रही... 15 मिनट बाद सुरक्षा कर्मियों की नींद खुली, पर अफ़सोस कि तब तक उस बेचारे के प्राण पखेरू उड़ चुके थे 

परेशानी का सबब यह एक हादसा भर नहीं है बल्कि यह भी है कि कहीं भी, किसी की भी कोई जवाबदेही तय नहीं है...

केवल कोई चिड़ियाघर ही नहीं बल्कि अगर कही भी सुरक्षा का अच्छा प्रबंध, चाकचौबंद व्यवस्था नहीं हो सकती है तो या तो उसे आम पब्लिक के लिए बंद कर देना चाहिए या फिर चेतावनी लिख देनी चाहिए कि हम असमर्थ हैं, अपनी रक्षा स्वयं करें!

देश के हर एक नागरिक का फ़र्ज़ है ना सिर्फ अपनी जान की हिफाज़त करना बल्कि देश / प्रशासन के द्वारा बनाए कानूनों / नियमों का पालन करना, हमें यह समझना होगा कि यह नियम स्वयं हमारी सुरक्षा के लिए ही बनाए जाते हैं!

हालाँकि इस सत्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में हर इक का बौद्धिक स्तर इतना बेहतर नहीं होता कि नियमों के अनुसार चलें साथ ही साथ यह भी बात है कि अक्सर वोह लोग भी रोमांच / सैडनेस इत्यादि में जान जोखिम में डाल देते हैं जो नार्मल लाइफ में सजग रहते हैं।

और इसी कारण सरकार सुरक्षा के सख्त मानकों का पालन करती है, जैसे कि हेलमेट ना पहनने से ड्राइव करने वाले को खतरा होता है फिर भी लोग नहीं पहनना चाहते, मगर सरकार ने अनिवार्य कर रखा है।

इसी तरह कोई भी प्रशासन केवल यह लिखकर हाथ नहीं झाड सकते कि आगे खतरा है। बल्कि ऐसी जगहों पर कम से कम 12-15 फुट जाली होना अति-आवश्यक है, जबकि वहां 2-3 फुट की जाली ही लगी हुई है। साथ ही दुर्घटना होने की स्थिति में ट्रेंड सुरक्षा कर्मी कम से कम ऐसे स्थानों पर अवश्य मौजूद रहने चाहिए।





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पुरानी स्ट्रेटिजी है भीतरघात

'आप' को इससे भी ज़्यादा भीतरघात के लिए तैयार रहना चाहिए, यह तो किसी को बदनाम करने और उसकी मुहीम को नुक्सान पहुंचाने की सदियों पुरानी स्ट्रेटिजी है। 

मुहम्मद (स.अ.व.) के समय जब कबीले के कबीले उनके साथ आने लगे तो दुश्मनों ने स्ट्रेटिजी बनाई, वह अपने लोगो को भी उनके साथ कर देते और कुछ समय बाद वह लोग उनपर इलज़ाम लगा कर अलग हो जाते, जिससे कि उनके साथ आ चुके या आ रहे लोगो में भ्रम फ़ैल सके। मगर मुहम्मद (स.अ.व.) के आला क़िरदार और सत्य के पथ पर चलने के कारण उनके साथियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

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निकाह की 'हाँ'



हमारे देश के मुस्लिम समुदाय में विशेषकर उत्तर भारत में लड़कों और खासकर लड़कियों से शादी से पहले अकसर उनकी मर्ज़ी तक मालूम नही की जाती है, एक-दुसरे से मिलना या बात करना तो बहुत दूर् की बात है... रिश्ते लड़के-लड़की की पसंद की जगह माँ-बाप या रिश्तेदारों की पसंद से होते हैं. ऐसी स्थिति में निकाह के समय काज़ी के द्वारा 'हाँ' या 'ना' मालूम करने का क्या औचित्य रह जाता है???


शादी के बाद पति-पत्नी विवाह को नियति समझ कर ढोते रहते हैं और हालत से समझौता करके जीवनी चलाते है...

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम‌) ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का प्रस्ताव दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी (स.) ने फरमाया:

 
“तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’
इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

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परिस्थितियों को आत्म विश्वास से करें काबू



जब आपका मजाक उड़ाया जाता हैं तब इसको नियति ना बनने दें, बल्कि ऐसी परिस्थिति में इस चुनौती को आप अपने दृढ़ विश्वास के द्वारा और भी अधिक आसानी से अपने हित में कर सकते हैं.

मजाक उड़ाना एक नकारात्मक प्रतिक्रिया है, जिसके कारण सकारात्मक प्रवत्ति के लोग दुगने वेग से आपके पक्ष में आएँगे - Shah Nawaz

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घटिया राजनीती - ऊबते लोग


दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...


देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...

और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?

ख़ुदा खैर करे!!!
 
 
(Photo courtesy: Aajtak)

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