साम्प्रदायिकता 'भ्रष्टाचार' की ढाल है


दिल्ली नतीजों के गूढ़ में निहित हैं कि जनता आज भी सांप्रदायिक ताकतों की घिनौनी राजनीति के खिलाफ है। देश का 'आम आदमी' यह जान चुका है कि 'साम्प्रदायिकता' और कुछ नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की ढाल है। 

सम्प्रयदाय अथवा ज़ात-पात की राजनीति करने वाले हमें इन मुद्दों में घुमाए रखना चाहते हैं, जिससे कि सत्ता सुख भोगने का उनका मक़सद आसानी से हल होता रहे और उनके द्वारा फैलाए जा रहे भ्रष्टाचार के जाल पर किसी का ध्यान ना जा पाए।

यह नतीजें राजनेताओं के लिए सन्देश है कि देश का युवा जागरूक हो रहा है, जो किसी भी कीमत पर खुद को बेवक़ूफ़ बनाने वालों को और बर्दाश्त नहीं करना चाहता!

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तेल का खेल

सरकार ने पिछले ढाई महीने में तीन बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई है, अगर यह एक्साइज ड्यूटी न बढ़ाई जाती तो पेट्रोल 5.75 रुपये और डीजल 4.50 रुपये और सस्ता होता।

हाल के महीनों में क्रूड ऑयल के मंदी के दौर में पहुंचने के कारण इसकी कीमत में लगभग 37 पर्सेंट गिरावट आई है, मगर देश में अभी तक पेट्रोल की कीमतों में करीब 11 प्रतिशत और डीजल में केवल 8 प्रतिशत की कमी ही की गई है।

और उसपर विज्ञापन तेल की कीमतों में राहत के दिए जा रहे हैं! :P


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इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक के खात्मे की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी मुसलामानों की ही है

उफ्फ्फ्फ़ कैसे हैवान हैं यह, जो बच्चों तक पर तरस नहीं खाते... यह लोग इंसानियत पर धब्बा हैं, आज दुनिया के सभी मुसलमानो को एक होकर इन हैवानों के खिलाफ उठ खड़े होने की ज़रूरत हैं! मुसलमानों पर ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी इसलिए भी है क्योकि यह लोग इस्लाम का नाम लेकर ऐसी हैवानियत फैलाते हैं... बेशक यह दुनिया के हर अमन पसंद का काम है कि दुनिया से हर मासूम पर ज़ुल्म करने वाले आतंकी का सफ़ाया हो!

हालाँकि दुनिया में अनेकों तरह की आतंकवादी हरकतें चल रही हैं, पर अगर बात इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक की करूँ तो इसे समाप्त करने के लिए पहल ख़ुद मुसलमानों को ही करनी पड़ेगी...

मैं यह हरगिज़ नहीं मानता कि ऐसी कोई भी हरक़त कोई मुसलमान कर सकता है, और असल बात यह है कि ऐसी हरकतें तो कोई इंसान कर ही नहीं सकता है! इंसानियत मर गई है इन लोगों के अंदर से, आज इस्लाम को इन लोगों की हैवानियत से महफूज़ करने की ईमानदार मेहनत की ज़रूरत है...

अल्लाह हम सब की हिफाज़त फरमाए, पूरी दुनिया के इंसानो की!

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इबादत का मतलब है 'हक़ अदा करना'

इबादत या पूजा का असल मतलब है 'हक़ अदा करना' और हमारे रब ने हम पर दो तरह के हक़ रखें हैं, एक खुद उसके जैसे कि नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात इत्यादि और दूसरे बाकियों के हम पर हक़ हैं जैसे माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी-बच्चों के हक़, उसके बाद रिश्तेदारों, पडौसियों, यतीमों, गरीबों, मजबूरों, भूखे-प्यासों के, सड़क पर चलने वालों के हक़... इसी तरह परिंदों, जानवरों के भी हुकूक हैं, यहाँ तक कि हमारे शरीर के अंगों के भी हम पर हुकूक हैं, जैसे हमारे शरीर / सेहत / जीवन की हिफाज़त, नज़रों की परहेज़गारी, शर्मगाह की पाकीज़गी इत्यादि...

मगर हमें यह याद रखना आवश्यक है कि अल्लाह गफूरुर-रहीम है, उससे बड़ा रहम करने वाला, क्षमा करने वाला कोई और नहीं हो सकता और उसने आखिरत (परलोक) में रहम की बारिश का वादा किया है, लेकिन उसके अलावा बाकियों के हुकूक हमें अदा करने ही होंगे, उसने मुहम्मद (स) के हाथों हमें यह पैगाम भेज दिया है कि इंसान आख़िरत में किसी को अपनी एक नेकी भी नहीं देगा और अपने हर हक़ का बदला लेगा...

तो सोचिये हमें ज्यादा मेहनत कहाँ करने की ज़रूरत है?

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गलती किसी की, सजा किसी को...


उबेर कैब पर बैन को लोग हास्यपद ठहरा रहे हैं, तर्क है कि किसी एक ड्राइवर की गलती का खामियाज़ा पूरी कंपनी क्यों भुगते...

कभी सोचा है कि आप ही लोग किसी एक मुस्लिम के किसी गुनाह में नाम आने भर से पूरी क़ौम को ज़िम्मेदार ठहराते हैं?


इस पोस्ट पर कुछ अच्छा विचार-विमर्श यहाँ पढ़ा जा सकता है:

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ब्रेनवॉश्ड होने का मुख्य कारण है अंधविश्वास


हमारी अंधविश्वासी प्रवृति और धर्म विरुद्ध बात सुनने पर आग बबूला हो जाने वाले जूनून का फायदा शातिर लोग हमेशा से ही उठाते आए हैं, कभी दंगे करवाकर और कभी आतंक फैला कर।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि आम लोगो का ब्रेनवॉश केवल आतंक की फैक्ट्रियां चलाने या दंगों की इबारतें लिखने के लिए ही किया जाता हो, बल्कि इसी कारणवश इंसान इस क़दर ज़ालिम बन जाता है कि मासूम बच्चों की बलि देने से भी नहीं चूकता!

और इसके पीछे की मुख्य वजह होती है धर्म का अल्प ज्ञान और बिना जाँचे-परखे आँखमूँद कर विश्वास करना यानी अंधविश्वास! इसके लिए किसी धर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, मगर धर्मगुरुओं को ज़रूर ठहराया जा सकता है। अपना काम यानी सही जानकारी लोगों तक ना पहुंचा पाने जैसी वजहों से...

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राजनीति में भी चलती है बाबागिरी

देश के लोगों को वैसे भी हर फिल्ड में इन ढोंगी बाबाओ का तरीक़ा ही पसंद आता है। हम हमेशा शाही अंदाज़ में रहने और कभी ना पुरे होने वाले सपने दिखाने वाले नेताओं को ही पसंद करते आए हैं। 

यह सारा खेल परसेप्शन्स का है, जिसके ज़रिये दिव्य अथवा मसीहा की छवि गढ़ी जाती है और अलौकिक सपने दिखाए जाते हैं। लोगों के मन में अगर एक बार किसी के लिए उद्धार करने वाले मसीहा की धारणा उत्पन्न हो गई तो फिर वोह चाहे कुछ भी करता रहे।

उनकी अंधभक्ति में हम ऐसे लीन हो जाते हैं कि उनके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को सुनना या पुख्ता सबूतों के मिलने पर भी हकीक़त को क़ुबूल करना तो छोड़ो, उनपर अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

सादगी से रहने वालों में हमें स्टारडम नज़र नहीं आता, काम करने वाले इक्का दुक्का लोग राजनीति में आते भी हैं तो वोह किसे पसंद आते हैं?

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काश ऐसा हो!


जिस तरह ओखला की मस्जिद में सूअर का गोश्त मिलने पर मुसलमान नहीं भड़के और फ़ौरन पुलिस को फोन किया, क्या मैं यह उम्मीद कर सकता हूँ कि बाकी जगह के मुसलमान भी ऐसा ही करेंगे?

और ठीक इसी तरह मंदिर में मांस मिलने जैसी घिनौनी हरकत पर हिन्दू भी ऐसा ही करेंगे?

अगर जवाब 'हाँ' है तो समझ लीजिये कि नफ़रत फ़ैलाने की कोशिशें हार जाएंगी, वर्ना मासूम दंगो की भेट चढ़ते रहेंगे और नफ़रत की राजनीति करने वाले अपने मक़सद में कामयाब होते रहेंगे!



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साम्प्रदायिकता से निपटने में ओखला के लोगो ने मिसाल कायम की

ओखला के लोगो को सलाम करना चाहूंगा कि जिस तरह मदनपुर खादर स्थित मस्जिद में  मरा हुआ सूअर पाए जाने के बाद उन लोगो ने नफरत की राजनीति के मक़सद को समझकर, तनाव फैलाने की जगह पुलिस को इन्फॉर्म किया, वह काबिले तारीफ है।

 (Image Source: Indian Express)
मौके पर पहुंचे 'आम आदमी पार्टी' के नेता अमानउल्ला खान के द्वारा फ़ौरन इस मामले की जानकारी पुलिस को दी गई. उनका कहना है कि "कुछ अनजान लोग लगातार इस इलाके में तनाव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, मस्जिद में जो कुछ हुआ वह इसी की एक कड़ी है।"

काश त्रिलोकपुरी जैसी अन्य जगहों पर भी स्थानीय निवासियों ने ऐसा ही किया होता तो दिल्ली दंगो के दाग से शर्मसार नहीं होती... ऐसी साज़िशों से निपटने के लिए लोगो को सजग रहने और सही कदम उठाने की ज़रूरत है, ख़ासतौर पर चुनाव के समय! हमें समझना होगा कि जो राजनैतिक पार्टिया चंद वोटों की खातिर हमें लडवाती हैं, वोह खुद तो चुनाव के बाद अपना काम निकलने पर अलग हो जाती हैं, लेकिन इस नफरत को भुगतना आम जनता को ही पड़ता है!


और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर कब तक आम जनता इन नेताओं के झांसे में आती रहेगी?

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रब की ताकत और उसका निज़ाम

एक रब की ताकत है और एक उसका निज़ाम है, ताकत यह यह है कि वह जो चाहता है वो हो जाता है (कुन-फया कुन)। और निज़ाम यह है कि बच्चा पैदा होने के लिए महिला-पुरुष का सम्बन्ध और तक़रीबन 9 महीने का वक़्त ज़रूरी है।

हालाँकि वह खुद उस निज़ाम पर पाबन्द नहीं है और इंसानो को यह दर्शाने के लिए अक्सर वह निज़ाम से इतर चीज़ें दुनिया में दिखाता रहता है, जैसे कि उसने आदम (अ.) को बिना माँ-बाप और ईसा मसीह (अ.) को बिना बाप के पैदा किया।

ठीक इसी तरह हर इक काम उसके हुक्म से होता है यह उसकी ताकत है और हमसे सम्बंधित काम हमारी मर्ज़ी और कोशिश के एतबार से ही अंजाम दिए जाते हैं यह उसका निज़ाम है! जिससे कि हमारे कर्मों का हमसे हिसाब लिया सके। 

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