दिल्ली के बाशिंदे हैवानियत की सारी सीमाएँ रोंदते जा रहे हैं, आखिर इसका ज़िम्मेदार कौन है? हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं।
दिल्ली में घूमती हैवानो की भीड़
जागते रहो
'जागते रहो' कि सदा लगाने वाले का मकसद कम-अज़-कम खुद को जगाने का तो होता ही है...
तो क्या डंडों से सफाया होगा आतंकवाद का?
हद है... सीआरपीएफ के जवानों को कश्मीर पुलिस द्वारा घाटी में बिना हथियारों के लड़ने पर मजबूर किया जा रहा है। मतलब आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लड़ने के लिए लकड़ी का डंडा??? इससे वह खुद की सुरक्षा करेंगे या आम जनता की?
ईनाम की इच्छा
स्वर्ग तो अच्छे कर्म करने वालों के लिए रब की तरफ से ईनाम है और ईनाम की लालसा में अच्छे कर्म करने वाला श्रेष्ठ कैसे हुआ भला? हालाँकि फायदे या नुक्सान की सम्भावना आमतौर पर मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रोत्साहित अथवा हतोत्साहित करती ही हैं।
मैं अपने पैदा करने वाले और मेरे लिए यह दुनिया-जहान की अरबों-खरबों चीज़ें बनाने वाले का शुक्रगुज़ार ही नहीं बल्कि आशिक़ हूँ, फिर जिससे इश्क होता है उसकी रज़ा में लुत्फ़ और नाराज़गी ही से दुःख होना स्वाभाविक ही है।
ज़ालिम का विरोध और मजलूम का समर्थन
यह तेरा घर, यह मेरा घर?
धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता
धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता के एक साथ चलने में कोई भी परेशानी नहीं है लेकिन धर्मान्धता और धर्मनिरपेक्षता का एक साथ चलना मुश्किल है। कुछ भी तो नहीं बदला है
इतने नारों और इतनी कवायदों के बाद भी कुछ नहीं बदला है... शर्म का मुकाम तो यह है कि हम पुरुष आज भी सड़कों पर लड़कियों को घूरते, उनपर फिकरे कसते नज़र आ रहे हैं... बलात्कारी आज भी टारगेट तलाश रहे हैं और उन्हें रोक सकने वाले आज भी मुंह को सिल कर और हाथों को बाँध कर अपने-अपनी राह पकड़ रहे हैं...
पता नहीं उनका क्या मकसद था?
और विश्वास करिये हम लोग हिंसक नहीं थे, क्योंकि हम तो खुद हिंसा के खिलाफ आन्दोलन कर रहे थे.... लेकिन यह भी सच है कि हम से कहीं ज़्यादा संख्या में लोग वहां हिंसक प्रदर्शन कर रहे थे, पता नहीं उनके उस प्रदर्शन का क्या मकसद था?







