पुरानी स्ट्रेटिजी है भीतरघात
'आप' को इससे भी ज़्यादा भीतरघात के लिए तैयार रहना चाहिए, यह तो किसी को बदनाम करने और उसकी मुहीम को नुक्सान पहुंचाने की सदियों पुरानी स्ट्रेटिजी है।
मुहम्मद (स.अ.व.) के समय जब कबीले के कबीले उनके साथ आने लगे तो दुश्मनों ने स्ट्रेटिजी बनाई, वह अपने लोगो को भी उनके साथ कर देते और कुछ समय बाद वह लोग उनपर इलज़ाम लगा कर अलग हो जाते, जिससे कि उनके साथ आ चुके या आ रहे लोगो में भ्रम फ़ैल सके। मगर मुहम्मद (स.अ.व.) के आला क़िरदार और सत्य के पथ पर चलने के कारण उनके साथियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा।
निकाह की 'हाँ'
हमारे देश के मुस्लिम समुदाय में विशेषकर उत्तर भारत में लड़कों और खासकर लड़कियों से शादी से पहले अकसर उनकी मर्ज़ी तक मालूम नही की जाती है, एक-दुसरे से मिलना या बात करना तो बहुत दूर् की बात है... रिश्ते लड़के-लड़की की पसंद की जगह माँ-बाप या रिश्तेदारों की पसंद से होते हैं. ऐसी स्थिति में निकाह के समय काज़ी के द्वारा 'हाँ' या 'ना' मालूम करने का क्या औचित्य रह जाता है???
शादी के बाद पति-पत्नी विवाह को नियति समझ कर ढोते रहते हैं और हालत से समझौता करके जीवनी चलाते है...
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का प्रस्ताव दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी (स.) ने फरमाया:
“तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’
इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।
घटिया राजनीती - ऊबते लोग
दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...
देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...
और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?
ख़ुदा खैर करे!!!
(Photo courtesy: Aajtak)
सृजन एवं सर्जक
ऐसी सीपियाँ जो देखने में खूबसूरती का बेजोड़ नमूना होती हैं, जबकि उन्हें देखने वाला कोई 'अक्लमंद' इंसान वहां मौजूद नहीं होता।
और दूसरी तरफ इंसान है जो बिना मशीनरी और कच्चे माल के कुछ भी बनाने में असमर्थ है, मगर फिर भी अकड़ता फिरता है।
सत्य में पक्षपात कैसा?
हिन्दू की बात हो, ना कोई मुसलमान की
अब तो हर इक बात हो बस ईमान की
हिन्दू-मुसलिम की जगह सत्य की तरफदारी होनी चाहिए। अक्सर लोग ऐसा करते भी हैं, मगर कुछ लोगो को छोड़कर। जिनके लिए सही-गलत को देखने का चश्मा धार्मिक अथवा जातीय भेदभाव से प्रभावित होकर गुज़रता है। कुछ अज्ञानतावश ऐसा करते हैं तो कुछ राजनैतिक दुष्प्रचार के कारण पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर।
इस हालात से तभी निजात पाई जा सकती है, जबकि देश को धर्मों-जातियों में बाटने की राजनीति का देश से खात्मा कर दिया जाए!
हम शौक़ से हिन्दू या मुसलमान बनें
कुछ भी बन जाएँ मगर पहले इक इंसान बनें।
रावण-दहन ना देख पाने की मायूसी
बेटियां बहुत नाराज़ थी! बड़ी बिटिया 'ऐना' बोली कि आप अच्छे नहीं हैं, आपने promise किया था और break कर दिया!
कल दोनों बेटियों को रावण दहन दिखाने ले कर गया था, मगर कल बहुत ही व्यवस्थित कार्यक्रम था। इस बार खाली मैदान के आगे बैठने का इंतजाम किया गया था, जिसको बड़े से पांडाल से कवर किया गया था। मगर उसमें अन्दर जाने के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी थी।
हालाँकि पीछे से वीआईपी पास से जाने का इंतजाम था, मगर मुझे वहां से अन्दर जाना घंटों से लाइन में लगी इतनी भारी भीड़ के साथ अन्याय लगा। इसलिए मैं बाहर से ही बेटियों को किसी तरह समझा-बुझा कर वापिस ले आया... मगर उनका सारा उत्साह मायूसी में तब्दील हो गया!
नेताओं की नकली धर्मनिरपेक्षता
नकली धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर 'धर्मनिरपेक्षता' को बदनाम करने वाली पार्टियाँ चाहे जितना मर्ज़ी धार्मिक भेदभाव फैलाएं, वोटों के लिए दंगों की साजिशों में शामिल रहें, इनकी छवि धर्मनिरपेक्ष ही रहने वाली है।
हमारे बौद्धिक विकास के स्तर का इसी से अंदाज़ा लग जाता है। आज भी हम बड़े दुश्मन से निपटने के लिए छोटे दुश्मन का सहारा लेने वाली सोच के ग़ुलाम हैं
हुक़्म नहीं है 'फतवा'
'फतवा' केवल सवाल करने पर ही दिया जाता है और मालूम करने वाले व्यक्ति के लिए ही होता है। ज़रूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सही हो। क्योंकि फतवा विशेष परिस्थिति के अनुसार इस्लामिक उसूलों की रौशनी में दी गयी 'सलाह' या 'मार्गदर्शन' का नाम है। तथा सम्बंधित व्यक्ति उसका पालन अथवा नज़रअंदाज़ कर सकता है। यहाँ तक कि एक ही परिस्थिति पर अलग-अलग राय के अनुसार 'फतवा' भी अलग-अलग हो सकता है।
किसी भी 'फतवे' की व्याख्या के लिए मालूम किये गए प्रश्न और परिस्थितियों का गहरा अध्यन आवश्यक होता है।
अक्सर 'फतवा' को 'हुक्म' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। हालाँकि जानकारी के अभाव में अक्सर लोग फतवे को हुक्म ही समझते हैं।
keywords: islamic fatwa is not order
क्योंकि मानसिक विक्षिप्त वोटर नहीं हैं
क्या विकास का फटा ढोल बजाने वाली सरकारों के पास सड़कों पर दर-बदर की ठोकरे खाने वाले मानसिक विक्षिप्त लोगो के लिए कोई प्लान नहीं है? उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है? उनकी मदद के लिए कोई बजट नहीं? या कोई ऐसा बिल जो मंत्रिमंडल समूह ने अप्रूव कर दिया हो या लोकसभा/राज्यसभा में हो?
कुछ मानवीय संवेदनाएं बची हैं या बस वोटरों को ही लुभाया जाएगा?
नहीं, बस यूँ ही मालूम कर लिया... सुना है आजकल 'भारत निर्माण' हो रहा है..
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