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हत्या, मुआवज़ा और उसमें धार्मिक एंगल की शर्मनाक कोशिश

अपनी ईमानदारी और धमकियों के बावजूद करप्शन के आगे नहीं झुकने के कारण क़त्ल कर दिए गए NDMC स्टेट मैनेजर मुहम्मद मोईन ख़ान के परिवार को दिल्ली सरकार द्वारा 1 करोड़ रूपये की मदद को कई अंधभक्त बेशर्मी के साथ धार्मिक एंगल देने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे मेसेजेस को व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया साइट्स पर नफरत फैलाने की नियत से खूब शेयर किया जा रहा है।

हालाँकि दिल्ली सरकार की 1 करोड़ रूपये की मदद वाली पॉलिसी केवल उन सरकारी कर्मचारियों के लिए है जो अपने कर्तव्य को निभाने के चलते मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं अथवा क़त्ल कर दिए जाते हैं। काश यह लोग इस तरह की मदद प्राप्त करने वालों की सूचि देख लेते तो शायद ऐसी घटिया सोच सामने नहीं लाते। 

मुहम्मद मोईन ख़ान होटल 'द कनॉट' की लीज़ टर्म के फाइनल ऑर्डर पर हस्ताक्षर करने वाले थे, जिसके लिए उन्हें खरीदने की कोशिश हुई, धमकियां दी गईं पर जब वो नहीं झुके तो उनकी हत्या कर दी गई। हालाँकि यह जानकारी भी सामने आ रही है कि भाजपा नेता और NDMC के वाईस चैरयरमेन करण सिंह ने तंवर ने मोईन खान की हत्या से 11 दिन पहले LG नजीब जंग से उन्हें NDMC के असिस्टेंट लीगल एडवाइज़र के पद से हटाने की सिफारिश भी की थी और इस सिफारिश के चलते उनपर इस हत्याकांड में शामिल होने के आरोप भी लग रहे हैं। 

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प्रदुषण के ख़तरे पर सम-विषम फार्मूला और हमारी ज़िम्मेदारी

दिल्ली सरकार ने गाड़ियों को चलाने का सम-विषम फार्मूला सामने रखा, हो सकता है नाकामयाब रहे और यह भी हो सकता है कि कामयाब हो जाए... मगर हम लोग विषय की गंभीरता को समझने और कार पूल, सार्वजानिक परिवहन या इलेक्ट्रिक  इस्तेमाल करने की बात करने की जगह चुटकुले बना रहे हैं, कानून का तोड़ बताते फिर रहे हैं... जैसे कि प्रदूषण का नुकसान केवल केजरीवाल के बच्चों को ही होने वाला हो तथा हम और हमारे बच्चे सुरक्षित हों!

अगर वाकई ऐसा है तो फिर करते रहिये जो 'जी' चाहे, नहीं तो फिर प्रदुषण को रोकने की अपनी तरफ से भी पूरी कोशिश करिये, वर्ना आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी!

हालाँकि यह भी सत्य है कि केवल इसी फॉर्मूले से हल नहीं निकलेगा, कुछ और फैसले भी लेने पड़ेंगे जैसा कि दिल्ली सरकार ने 4-5 महीने पहले अनाउंस किया था कि दिल्ली में एक परिवार को एक ही गाडी की इजाज़त मिलेगी और पहले ही गाडी की पार्किंग की जगह भी बतानी पड़ेगी, वर्ना गाडी नहीं खरीद पाएंगे।

कुछ लोग कह रहे हैं कि कहना आसान है, हालाँकि यह बात सही भी है कि कहना आसान है, कहना वाकई आसान होता है और करना मुश्किल! मगर अब पानी सर से ऊपर गुज़र चुका है बल्कि काफी पहले ही गुज़र चूका है, पर कम से कम आज तो ज़रूरत हर मुश्किल काम को अमल में लाने की है.... अगर खुदा ना खास्ता कोई एक प्रयोग फेल होता है तो कई और करने पड़ेंगे, लेकिन अगर आने वाली जेनरेशन को बचाना है तो मुश्किल फैसले करने ही पड़ेंगे, केवल सरकार को ही नहीं बल्कि हमें भी... हमारे भी फ्यूचर का उतना ही सवाल है।

कई लोगों को इस फॉर्मूले के नाकामयाब रहने का भी डर सता रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि देश की जनता को कानून का डर नहीं होता, प्रदुषण से होने वाले नुकसान की चिंता नहीं है और यह भी कि हम लोग अपना आराम नहीं छोड़ना चाहते हैं... और समाज को देखकर काफी हद तक उनका तर्क भी सही लगता है, मगर यह सोचकर हाथ पर हाथ धार कर नहीं बैठा जा सकता है!

दिल्ली सरकार ने ‪#‎EvenOddFormula‬‬ के साथ-साथ कुछ और भी कदम उठाएं हैं जैसा कि सड़कों पर धूल को साफ़ करके साइड करने की जगह वेक्यूम क्लीनिंग की योजना है कमर्शियल गाडियो का एंट्री टाइम 9 बजे की जगह को रात 11 बजे किया गया है, क्योंकि उस समय तक दिल्ली में पहले ही काफी ट्रैफिक रहता है, साथ में कमर्शियल व्हीकल्स के आ जाने से स्थिति और भी खराब हो जाती हैज्ञात रहे कि ट्रेफिक जाम भी प्रदुषण का बड़ा कारण होता है। 

दिल्ली के दो पॉवर प्लांट्स बंद किये जा रहे हैं, जिनका उत्पाद कम हैं और उनपर निर्भरता भी कम हैं। प्रदुषण सर्टिफिकेट सेंट्रलाइज किये गए हैं, अर्थात अब प्रदुषण सर्टिफिकेट तब ही मिलेगा जबकि गाडी का प्रदूषण निर्धारित मानको से कम होगा, क्योंकि वाहन की जानकारी केवल जाँच पॉइंट पर ही नहीं बल्कि सेन्ट्रल पॉइंट तक भी आटोमेटिक पहुँच जाएगी। 10 साल से पुरानी डीज़ल गाडियो को बंद किया जा रहा है, क्योंकि प्रदूषण में इनका भी योगदान काफी हैं। साथ ही खुले में कूड़ा जलाने पर लगे प्रतिबंध को और सख्त बनाया जा रहा हैं

हालाँकि डीज़ल गाड़ियों के नए रजिस्ट्रेशन पर बैन जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं पर इसके साथ-साथ डीज़ल से चलने वाले कमर्शियल व्हीकल्स पर लगाम लगनी चाहिए और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को और ज़्यादा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए


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असहिष्णुता नई नहीं है बल्कि सरकार का रवैया नया है....

रामगोपाल वर्मा और अनुपम खेर साहब के कहने का मतलब है कि अगर एक "हिन्दू बहुल राष्ट्र" में कोई 'मुस्लिम' एक कामयाब 'फिल्म स्टार' बन सकता है तो वहां "कुलबुर्गी, पानसरे जैसे लेखकों की हत्या और बाकी लेखकों को इन जैसा हश्र करने", "गाय के मांस खाने के नाम पर मारे जाने वाली घटनाएं", "छेड़खानी / धर्मपरिवर्तन की झूठी अफवाहें उड़ाकर" / "सांसदों, विधायकों के द्वारा व्हाट्सऐप इत्यादि के द्वारा भावनाएं भड़काकर", "सूअर / गाय के मांस के मंदिरों / मस्जिदों में मिलने पर होने वाले दंगों की बातें", "धर्म के नाम पर मकान / दूकान का ना मिलना", 'एक-दूसरे समुदाय के खिलाफ नफ़रत के कारण अलग-अलग बस्तियां बनाकर रहने" जैसी बातें ना केवल सरासर झूठी बल्कि मीडिया के द्वारा फैलाई साज़िशें होती हैं...

इसलिए सरकार को ऐसी घटनाओं को संज्ञान में नहीं लेना चाहिए, प्रधानमंत्री महोदय को ऐसी घटनाओं अथवा नफरत फैलाने के आरोपी नेताओं / विधायकों / सांसदों के खिलाफ सख्त सन्देश देने की कोई ज़रूरत ही नहीं है? 

हालाँकि यह सही है कि असहिष्णुता केवल पिछले अट्ठारह महीनों में नहीं आई है, जो आज असहिष्णु दिखाई दे रहे हैं वोह पहले से ही ऐसे हैं... फ़र्क़ सिर्फ इतना आया है कि मोदी सरकार यह मैसेज देने में फेल हुई है कि वह नफ़रत फैलाने वाले कट्टरपंथियों या फिर देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ है और उनसे सख्ती से निपटा जाएगा। जनता में इस विषय पर सरकार का गंभीर ना होने का मैसेज भी इसलिए गया क्योंकि पिछले कुछ महीनों में नफ़रत फैलाने वाले अधिकतर बयान भाजपा या फिर भाजपा समर्थक संगठनों के नेताओं की तरफ़ से आए हैं।

हर सरकार का काम आपसी सौहार्द को बढ़ावा देना, नफरत फैलाने वालों से सख्ती से निपटना और कानून का पालन ना करने वालों से सख्ती से निपटना होता है और हमें देश की सरकार से यह उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले समय पर वह उचित कदम उठाएगी! सरकार को यह चाहिए कि वह उससे यह उम्मीद या मांग करने वालों की मांग पर गंभीरता से विचार करे और यह सुनिश्चित करें कि वह देश को सुरक्षा का माहौल देने की अपनी प्रतिबद्धता का पूरी तरह से निर्वाहन करती रहेगी.

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'इस्लाम' किसी 'नाइंसाफी' को जायज़ नहीं ठहराता

इस्लाम में 'इंसाफ' बेहद अहम है, बल्कि इस्लामिक स्कॉलर्स मानते हैं कि रूह की तरह है, मतलब अगर 'इस्लाम' का कोई और नाम हो सकता है तो वोह 'इंसाफ' है। इसमें किसी भी तरह की छोटी सी भी 'नाइंसाफी' को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग इस्लामिक बातों को तोड़-मरोड़ कर ऐसा करने की कोशिश करते हैं, दर-असल वोह कहीं ना कहीं आतंकी प्रोपेगेंडा का हिस्सा या फिर शिकार हैं। आज का समय खासतौर पर मुस्लिम जगत के लिए बेहद Crucial (महत्वपूर्ण) है, सतर्क रहने की ज़रूरत है। इसलिए जहाँ भी आपको लगे कि इस्लामिक बातों से किसी 'नाइंसाफी' को जस्टिफाई करने की कोशिश हो रही है तो उसे हरगिज़ सच नहीं माने और खूब अच्छी तरह तस्दीक़ करें।
हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि इस्लाम किसी क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप स्वयं 'सज़ा' देने की बात नहीं करता, मसलन अगर किसी को पता चले कि किसी व्यक्ति ने उसके परिवार वालों को मौत के घात उतार दिया तो वोह प्रतिक्रिया स्वरुप उसके परिवार को मार डाले। बल्कि इस्लाम में 'न्याय' का एक प्रोसेस बनाया गया है, अर्थात किसी का जुर्म साबित होने के बाद ही उसे सज़ा दी जा सकती है और सज़ा केवल प्रशासन के द्वारा ही दी जा सकती है!
#IslamAgainstTerrorism

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पुरुस्कार वापसी पर 'यूपीए की अन्ना आंदोलन वाली' गलती दोहरा रही है मोदी सरकार

देश के बुद्धिजीवियों के द्वारा पुरुस्कार वापसी को कांग्रेस प्रायोजित कहना बिलकुल उसी तरह की कुटिलता दर्शाता है जैसा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन के समय कांग्रेस सरकार ने उसे आर.एस.एस. (राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ) के द्वारा प्रायोजित बताया था। जबकि होना यह चाहिए कि अगर 'मुद्दा' सही है और खासतौर पर जनता को 'सही' लग रहा है तो उसके विरोध की जगह बातचीत की जाए और उचित कदम उठाए जाएं, फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता है, चाहे उसके पीछे कोई हो या नहीं हो। राजनैतिक दलों को यह समझना चाहिए कि इस तरह के आन्दोलनों को सुलझाने की जगह जितना दबाने और बदनाम करने की कोशिश की जाती है वह उतने ही तेज़ी से जनआंदोलन बनते जाते हैं।

कांग्रेस सरकार यही सोच कर बैठी रही, इसी बात पर अड़ी रही, यहाँ तक कि उसने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि भ्रष्टाचार का मुद्दा जनता के दिलों में घर करता जा रहा है और उसका खामियाज़ा उसे चुनाव में भुगतना पड़ा, अगर यह मान भी लिया जाए कि उसके पीछे RSS था तब भी भ्रष्टाचार एक ज़रूरी मुद्दा था और वोह भी खासतौर पर इसलिए क्योंकि उस समय भ्रष्टाचार पर चर्चा चरम पर थी। किसी भी सरकार को ऐसे समय बातचीत और जनता की मांगों पर अमल की नीति अपनानी चाहिए, ज़बरदस्ती दबाने की कोशिशें जनता को नागवार गुज़रती आई हैं और आगे भी नागवार गुज़रती रहने वाली हैं।

जो 'अकड़' पहले यूपीए को ले डूबी थी, वही अब एनडीए की गले की फंस बनती जा रही है। लेखकों की अभिव्यक्ति का दमन और भाजपाई नेताओं के दूसरे समुदाय के खिलाफ को भड़काऊ बयान सबको नज़र आ रहे हैं, मगर सरकार को नज़र ही नहीं आ रहे हैं, यहाँ होना तो यह चाहिए था कि सरकार ऐसे तत्वों पर रोक लगाने की नीति अपनाए और जनता मैं इसका मैसेज भेजे मगर इसके उलट सरकार के मंत्री लेखकों के इस आंदोलन को देश की अस्मिता से जोड़ने लगे और इससे जुड़े लोगों को देशद्रोही ठहरने लगे। जबकि यह समझना चाहिए कि अब भाजपा विपक्ष नहीं है, बल्कि सरकार में है। इसलिए उसके नेताओं या विचारधारा से जुड़े लोगों के बयान सरकार का नजरिया माना जा रहा है, खासतौर पर इसलिए भी क्योंकि सरकार या पार्टी की तरफ से ऐसे लोगों को चुप कराने के प्रयास नहीं किये गए और ना ही लेखकों से संवाद कायम करके अभिव्यक्ति का दमन करने वालों से निपटने की बात कही गई।

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चार 'अ'के कारण हारी भाजपा बिहार

मुझे लगता है कि बिहार में भाजपा की इस हार में 'असंवेदशीलता', 'आरक्षण', 'अमित शाह' और 'अखलाक़' ने मुख्य भूमिका निभाई मतलब भाजपाई नेताओं की असंवेदनशील भाषणबाज़ी, आरक्षण के विरुद्ध मोहन भगवत का बयान, अमित शाह की घमंड भरी भाषा और अखलाक़ की मौत की सियासत...

मैं नितीश को एक अच्छा व्यक्ति मानता हूँ, मगर आरजेडी का ज़्यादा सीट लाना बिहार के लिए चिंतनीय प्रतीत हो रहा है हालाँकि जनादेश के बाद लालू जी से भी अब यही उम्मीद करनी चाहिए कि वोह उसी तरह बिहार की प्रगति में सहायक बनेंगे जैसे उन्होंने भारतीय रेलवे की प्रगति में अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी

इस चुनाव से यह सीख भी मिलती है कि आज के नए दौर में नेगेटिव पॉलिटिक्स वहीँ कारगर हो सकती है जहाँ जनता किसी के खिलाफ हो! जैसा कि लोकसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस के खिलाफ नेगेटिव प्रोपेगेंडा को पसंद किया था, मगर जहाँ लोग किसी के खिलाफ नहीं हैं वहां इस तरह की नेगेटिव स्ट्रेटेजी का यही हाल होना था जो पहले दिल्ली में केजरीवाल और अब बिहार में नितीश कुमार के खिलाफ भाजपाई स्ट्रेटेजी का हुआ

आज भाजपा में मोदी की स्थिति उस समय की क्रिकेट टीम में सचिन जैसी हो गई है, जहाँ सचिन के ऊपर पूरी टीम डिपेंड हो गई थी और जब वोह अच्छा करते थे तो टीम जीत जाती थी वर्ना हार जाया करती थी।

नफरत के द्वारा सत्ता हथियाने की कोशिशों का हारना अच्छी पहल है, वर्ना देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मुद्दा बनता और करप्शन ख़त्म करना तथा तरक्की की ओर बढ़ना नामुमकिन होता चला जाता।


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क्या यह लोकतंत्र है?

हम 50-55 प्रतिशत वोटिंग पर खुश हो जाते हैं और तर्क देते हैं कि यह पहले से ज़्यादा है और उस पर 20-30 प्रतिशत वोट लेने वाले प्रतिनिधि नियुक्त हो जाते हैं... पर क्या इतने कम वोटों से चुना गया व्यक्ति वाकई में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि इस सिनेरियो की जड़ में जाया जाए तो पता चलता है कि विजयी प्रत्याशी के समर्थकों की तुलना में विरोधी कई गुना ज़्यादा होते हैं?


क्या यह चिंतनीय नहीं है कि देश में लोकतंत्र आने के इतने साल बाद भी यह हाल है? और क्या इस स्थिति को 'लोकतंत्र' कहा भी जाना चाहिए?

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राजनीति में भी चलती है बाबागिरी

देश के लोगों को वैसे भी हर फिल्ड में इन ढोंगी बाबाओ का तरीक़ा ही पसंद आता है। हम हमेशा शाही अंदाज़ में रहने और कभी ना पुरे होने वाले सपने दिखाने वाले नेताओं को ही पसंद करते आए हैं। 

यह सारा खेल परसेप्शन्स का है, जिसके ज़रिये दिव्य अथवा मसीहा की छवि गढ़ी जाती है और अलौकिक सपने दिखाए जाते हैं। लोगों के मन में अगर एक बार किसी के लिए उद्धार करने वाले मसीहा की धारणा उत्पन्न हो गई तो फिर वोह चाहे कुछ भी करता रहे।

उनकी अंधभक्ति में हम ऐसे लीन हो जाते हैं कि उनके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को सुनना या पुख्ता सबूतों के मिलने पर भी हकीक़त को क़ुबूल करना तो छोड़ो, उनपर अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

सादगी से रहने वालों में हमें स्टारडम नज़र नहीं आता, काम करने वाले इक्का दुक्का लोग राजनीति में आते भी हैं तो वोह किसे पसंद आते हैं?

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काश ऐसा हो!


जिस तरह ओखला की मस्जिद में सूअर का गोश्त मिलने पर मुसलमान नहीं भड़के और फ़ौरन पुलिस को फोन किया, क्या मैं यह उम्मीद कर सकता हूँ कि बाकी जगह के मुसलमान भी ऐसा ही करेंगे?

और ठीक इसी तरह मंदिर में मांस मिलने जैसी घिनौनी हरकत पर हिन्दू भी ऐसा ही करेंगे?

अगर जवाब 'हाँ' है तो समझ लीजिये कि नफ़रत फ़ैलाने की कोशिशें हार जाएंगी, वर्ना मासूम दंगो की भेट चढ़ते रहेंगे और नफ़रत की राजनीति करने वाले अपने मक़सद में कामयाब होते रहेंगे!



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पत्रकारिता और उसका विरोध

पत्रकार कोई क्रन्तिकारी नहीं होता और ना ही उनका काम जनता की राय बनाना होता है बल्कि पत्रकारिता का मक़सद केवल जनता की राय को सामने लाना और इसी तरह किसी घटना के पीछे छुपे सच को बाहर लाना होना चाहिए।


हालाँकि इस कवायद में अक्सर तीखे सवाल किये जाते हैं, जिसमें से  बहुत सी बातें हमें पसंद आ सकती हैं और बहुत सी नापसंद। ऐसे में एक अच्छे लीडर का काम है विचलित हुए बिना धैर्य और चतुराई से जवाब देना। 

जहाँ तक आम आदमी की बात है तो उनसे केवल सम्बंधित विषय पर राय ही मांगी जा सकती है। ऐसे में किसी नेता या उसके समर्थकों के द्वारा पत्रकार की अभिव्यक्ति पर विचलित होना, गुस्सा दिखाना, साक्षात्कार को बीच में छोड़ देना या फिर कानून को अपने हाथ में लेने जैसे कृत निंदनीय हैं।

ऐसे कृत फासिस्ट मानसिकता को दर्शाते हैं, क्योंकि फ़सिज्म की पहचान ही यही है कि इसमें अपने खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज़ को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाता।





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जयललिता पर कोर्ट का फैसला गुनाहगार नेताओं के खिलाफ फिर से उम्मीद जगा रहा है

कुछ नेता गुनाहगार होने के बावजूद जनता को मानसिक गुलाम बनाकर चुनाव जीत जाते हैं और देश के सर्वोच्य पदों तक पहुँच जाते हैं... फिर उसपर सोचते हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा, हालाँकि हमारे देश में इनका अबतक कुछ बिगड़ता भी नहीं था।


मगर कुछ दिनों से नेताओं पर आए कोर्ट के फैसले इंसाफ की उम्मीद जगा रहे हैं, जयललिता पर आया फैसला भी इसी की एक कड़ी है! अगर देश के लोग जागरूक हो जाएं तो बाकी बचे अपराधी भी अपनी सही जगह पहुँच जाएं!





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क्या पीएम की आगवानी के लिए एक भी अमेरिकी प्रतिनिधि का ना होना देश का अपमान नहीं है?

क्या यह देश का अपमान नहीं कि हमारे देश का प्रधानमंत्री अमेरिकी यात्रा पर पहुंचे तो आगवानी के लिए वहां का कोई छोटे से छोटा मंत्री भी नहीं पहुंचे, यहाँ तक कि किसी को आगवानी के लिए ऑफिशियली अपोइंट भी ना किया जाए? हमारी एम्बेसी को उन्हें रिसीव करना पड़े!


यह हाल तब है जबकि उनका वर्तमान तो क्या अगर भूतपूर्व राष्ट्राध्यक्ष भी हमारे यहाँ आता है तो हम अपनी पलकें तक बिछा देते हैं! मेहमान नवाज़ी में कोई कसर नहीं छोड़ते।

कुछ लोगो का विचार है कि वोह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने गए हैं, अमेरिकी यात्रा पर नहीं। अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या अमेरिका की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? हमारे देश में सार्क देशों के सम्मलेन में आने वाले प्रतिनिधियों का भी हम ऐसे ही स्वागत करते हैं जैसे बाकी समय आए किसी प्रतिनिधि का। 

मैं बात-बात में अमेरिका की रट लगाने वालों से पूछना चाहता हूँ कि यह किस तरह का आचरण है कि कोई राष्ट्राध्यक्ष उनके देश में पधारे तो उसकी आगवानी भी ना की जाए? 

हमारे देश की विश्व में एक अहमियत है और देश का प्रधानमंत्री कोई एक व्यक्ति भर नहीं बल्कि 122 करोड़ लोगो का प्रतिनिधि होता है। फिर चाहे वह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने के लिए ही अमेरिका क्यों ना गए हों तब भी देश के प्रधानमंत्री को कम से कम इतना सम्मान तो मिलना ही चाहिए!





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पुरानी स्ट्रेटिजी है भीतरघात

'आप' को इससे भी ज़्यादा भीतरघात के लिए तैयार रहना चाहिए, यह तो किसी को बदनाम करने और उसकी मुहीम को नुक्सान पहुंचाने की सदियों पुरानी स्ट्रेटिजी है। 

मुहम्मद (स.अ.व.) के समय जब कबीले के कबीले उनके साथ आने लगे तो दुश्मनों ने स्ट्रेटिजी बनाई, वह अपने लोगो को भी उनके साथ कर देते और कुछ समय बाद वह लोग उनपर इलज़ाम लगा कर अलग हो जाते, जिससे कि उनके साथ आ चुके या आ रहे लोगो में भ्रम फ़ैल सके। मगर मुहम्मद (स.अ.व.) के आला क़िरदार और सत्य के पथ पर चलने के कारण उनके साथियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

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घटिया राजनीती - ऊबते लोग


दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...


देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...

और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?

ख़ुदा खैर करे!!!
 
 
(Photo courtesy: Aajtak)

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