पुरुस्कार वापसी पर 'यूपीए की अन्ना आंदोलन वाली' गलती दोहरा रही है मोदी सरकार

देश के बुद्धिजीवियों के द्वारा पुरुस्कार वापसी को कांग्रेस प्रायोजित कहना बिलकुल उसी तरह की कुटिलता दर्शाता है जैसा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन के समय कांग्रेस सरकार ने उसे आर.एस.एस. (राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ) के द्वारा प्रायोजित बताया था। जबकि होना यह चाहिए कि अगर 'मुद्दा' सही है और खासतौर पर जनता को 'सही' लग रहा है तो उसके विरोध की जगह बातचीत की जाए और उचित कदम उठाए जाएं, फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता है, चाहे उसके पीछे कोई हो या नहीं हो। राजनैतिक दलों को यह समझना चाहिए कि इस तरह के आन्दोलनों को सुलझाने की जगह जितना दबाने और बदनाम करने की कोशिश की जाती है वह उतने ही तेज़ी से जनआंदोलन बनते जाते हैं।

कांग्रेस सरकार यही सोच कर बैठी रही, इसी बात पर अड़ी रही, यहाँ तक कि उसने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि भ्रष्टाचार का मुद्दा जनता के दिलों में घर करता जा रहा है और उसका खामियाज़ा उसे चुनाव में भुगतना पड़ा, अगर यह मान भी लिया जाए कि उसके पीछे RSS था तब भी भ्रष्टाचार एक ज़रूरी मुद्दा था और वोह भी खासतौर पर इसलिए क्योंकि उस समय भ्रष्टाचार पर चर्चा चरम पर थी। किसी भी सरकार को ऐसे समय बातचीत और जनता की मांगों पर अमल की नीति अपनानी चाहिए, ज़बरदस्ती दबाने की कोशिशें जनता को नागवार गुज़रती आई हैं और आगे भी नागवार गुज़रती रहने वाली हैं।

जो 'अकड़' पहले यूपीए को ले डूबी थी, वही अब एनडीए की गले की फंस बनती जा रही है। लेखकों की अभिव्यक्ति का दमन और भाजपाई नेताओं के दूसरे समुदाय के खिलाफ को भड़काऊ बयान सबको नज़र आ रहे हैं, मगर सरकार को नज़र ही नहीं आ रहे हैं, यहाँ होना तो यह चाहिए था कि सरकार ऐसे तत्वों पर रोक लगाने की नीति अपनाए और जनता मैं इसका मैसेज भेजे मगर इसके उलट सरकार के मंत्री लेखकों के इस आंदोलन को देश की अस्मिता से जोड़ने लगे और इससे जुड़े लोगों को देशद्रोही ठहरने लगे। जबकि यह समझना चाहिए कि अब भाजपा विपक्ष नहीं है, बल्कि सरकार में है। इसलिए उसके नेताओं या विचारधारा से जुड़े लोगों के बयान सरकार का नजरिया माना जा रहा है, खासतौर पर इसलिए भी क्योंकि सरकार या पार्टी की तरफ से ऐसे लोगों को चुप कराने के प्रयास नहीं किये गए और ना ही लेखकों से संवाद कायम करके अभिव्यक्ति का दमन करने वालों से निपटने की बात कही गई।

Read More...

चार 'अ'के कारण हारी भाजपा बिहार

मुझे लगता है कि बिहार में भाजपा की इस हार में 'असंवेदशीलता', 'आरक्षण', 'अमित शाह' और 'अखलाक़' ने मुख्य भूमिका निभाई मतलब भाजपाई नेताओं की असंवेदनशील भाषणबाज़ी, आरक्षण के विरुद्ध मोहन भगवत का बयान, अमित शाह की घमंड भरी भाषा और अखलाक़ की मौत की सियासत...

मैं नितीश को एक अच्छा व्यक्ति मानता हूँ, मगर आरजेडी का ज़्यादा सीट लाना बिहार के लिए चिंतनीय प्रतीत हो रहा है हालाँकि जनादेश के बाद लालू जी से भी अब यही उम्मीद करनी चाहिए कि वोह उसी तरह बिहार की प्रगति में सहायक बनेंगे जैसे उन्होंने भारतीय रेलवे की प्रगति में अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी

इस चुनाव से यह सीख भी मिलती है कि आज के नए दौर में नेगेटिव पॉलिटिक्स वहीँ कारगर हो सकती है जहाँ जनता किसी के खिलाफ हो! जैसा कि लोकसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस के खिलाफ नेगेटिव प्रोपेगेंडा को पसंद किया था, मगर जहाँ लोग किसी के खिलाफ नहीं हैं वहां इस तरह की नेगेटिव स्ट्रेटेजी का यही हाल होना था जो पहले दिल्ली में केजरीवाल और अब बिहार में नितीश कुमार के खिलाफ भाजपाई स्ट्रेटेजी का हुआ

आज भाजपा में मोदी की स्थिति उस समय की क्रिकेट टीम में सचिन जैसी हो गई है, जहाँ सचिन के ऊपर पूरी टीम डिपेंड हो गई थी और जब वोह अच्छा करते थे तो टीम जीत जाती थी वर्ना हार जाया करती थी।

नफरत के द्वारा सत्ता हथियाने की कोशिशों का हारना अच्छी पहल है, वर्ना देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मुद्दा बनता और करप्शन ख़त्म करना तथा तरक्की की ओर बढ़ना नामुमकिन होता चला जाता।


Read More...

क्या यह लोकतंत्र है?

हम 50-55 प्रतिशत वोटिंग पर खुश हो जाते हैं और तर्क देते हैं कि यह पहले से ज़्यादा है और उस पर 20-30 प्रतिशत वोट लेने वाले प्रतिनिधि नियुक्त हो जाते हैं... पर क्या इतने कम वोटों से चुना गया व्यक्ति वाकई में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि इस सिनेरियो की जड़ में जाया जाए तो पता चलता है कि विजयी प्रत्याशी के समर्थकों की तुलना में विरोधी कई गुना ज़्यादा होते हैं?


क्या यह चिंतनीय नहीं है कि देश में लोकतंत्र आने के इतने साल बाद भी यह हाल है? और क्या इस स्थिति को 'लोकतंत्र' कहा भी जाना चाहिए?

Read More...

न्याय की भावना से दूर होते हैं कट्टरपंथी

कट्टरपंथी चाहे हिन्दुस्तानी हों, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी या फिर कहीं और के... इन सब का मिजाज़ एक ही होता है। इनमे मानने का जज़्बा नहीं होता, मनवाने का होता है। यह लोग अपने खिलाफ उठी आवाज़ को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं कर सकते। न्याय का इनसे दूर का भी वास्ता नहीं होता और यह स्वयं सज़ा देने में विश्वास करते हैं।
चाहे आस्तिक हों या नास्तिक यह लोग धर्म को केवल अपनी इगो शांत करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, अगर इनको बताया जाए कि उनकी सोच धर्म विरोधी है तो हरगिज़ नहीं मानेंगे।

Read More...

ईधी साहब से मानवता का सबक सीखना चाहिए



सिर्फ विरोधियों को ही नहीं बल्कि मुसलामानों को भी ईधी साहब से सीखना चाहिए कि
‪ इस्लाम‬ इंसानी हुक़ूक़ को ज़यादा अहमियत देना सिखाता है। दूसरों के हक़ अता करना और अपने हुक़ूक़ माफ़ करना सिखाता है... धैर्य, क्षमा और न्याय का हुक्म देता है। ईधी साहब के मानवता के सन्देश पर सिर्फ वाहवाही करने की नहीं बल्कि आत्मसात करने की ज़रूरत है!


मुहम्मद (स.) फरमाते हैं (व्याख्या) 'जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई' और एक जगह कहते हैं कि वह न्याय के दिन ऐसे लोगो के विरोधी होंगे" (बुखारी)

और क़ुरआन में अल्लाह ने बताया "...किन्तु जिसने धैर्य से काम लिया और क्षमा कर दिया वह उन कामों में से हैं जो (सफलता के लिए) 'आवश्यक' ठहरा दिए गए हैं। [42:43]"

Read More...

फिर कोई ‪‎कुत्ता‬, कोई कुत्ते का पिल्ला हो गया...

क्या कहूँ हाकिम का यूँ ज़मीर ढिल्ला हो गया

मिंटो-सेकिंडो में ही हर शेर बिल्ला हो गया


इन्तख़ाबों में तो थे हम 'आँख के तारे' सभी

फिर कोई ‪‎कुत्ता‬, कोई कुत्ते का पिल्ला हो गया


- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी

Read More...

हमारे देशप्रेम का इससे बढ़कर और क्या सबूत होगा कि हमने देश से मुहब्बत को 'चुना' है!

जिन्होंने पाकिस्तान माँगा उन्हें दिया गया और वोह चले गए, जिन्हें देश से मुहब्बत थी उन्होंने ना माँगा और ना ही मांगने वालों का साथ दिया... और यह इस बात का सबूत भी है क्योंकि जो भी मुसलमान हिन्दुस्तान में रुके उन्होंने देश से मुहब्बत को चुना है, जबकि हम पर संदेह के ज़हर भरे तीर चलाने वाले और राष्ट्रद्रोह की डिग्रियां बांटने लोगों की देश के प्रति निष्ठा जानने के लिए बस उनके अलफ़ाज़ ही काफी हैं। 

हैरत की बात यह भी है कि दूसरों को देशद्रोही ठहरने वालों का देश की आज़ादी में कोई योगदान भी नहीं है, जबकि हमारे बुज़ुर्गों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद छेड़ा था, उनके हाथों अपने सर कलम करवाना मंज़ूर किया था लेकिन झुकना हरगिज़ मंज़ूर नहीं किया था.

इस मौज़ूं पर राहत इंदौरी साहब ने क्या खूब लिखा है:
सभी का ख़ून है शामिल यहां कि मिट्टी में,
किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है

Read More...

अभिजीत ने दिखाया है गुलाम अली से भाईचारा :P


गायक अभिजीत के द्वारा गुलाम अली साहब को बेशर्म और डेंगू के मच्छर कहने पर नाराज़ मत होइए... ऐसा तो अक्सर होता है कि लोग 'दूसरों' को 'खुद' की तरह समझते हैं, मेरे भाई इसे ही तो '‎भाईचारा'‬ कहते हैं... :P 




Read More...

कहाँ हैं खुद को दिल्ली सरकार का मुखिया बताने वाले LG?


दिल्ली में डेंगू के प्रकोप के चलते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम लगातार कड़ी दौड़भाग करते नज़र आ रहे हैं, मगर स्वयं को दिल्ली सरकार का प्रमुख बताने वाले नजीब जंग पता नहीं कहाँ गायब हैं?... हाँ ऐसे समय में भी उनका अधिकारियों को मुख्यमंत्री का आर्डर ना मानने का फरमान ज़रूर दिखाई दिया।

वहीँ दिल्ली एमसीडी पर काबिज़ भाजपा भी नदारत है और आपदा में नेपाल तक की मदद को आतुर केंद्र सरकार भी दिल्ली में अभी तक राज्य सरकार की मदद की जगह राह में रोड़े ही अटकाती नज़र आ रही है।

Read More...

दहशतगरों के हाथ में 'इस्लाम'‬ नहीं है

नाहक़ के साथ दीन का ‪'‎पैग़ाम'‬ नहीं है
दहशतगरों के हाथ में ‪'इस्लाम'‬ नहीं है

उठ-उठ के मस्जिदों से गए हैं जो ‪'‎नमाज़ी‬'
लौटेंगे अगली ‪अज़ाँ‬ पर, ‪'नाराज़'‬ नहीं हैं
- Shahnawaz Siddiqui

Read More...