इस्लाम‬ की बुनियाद



दुनिया के शुरू से ही ‪इस्लाम‬ की बुनियाद तौहीद अर्थात "ला'इलाहा इल्लल्लाह"  है, जिसका तात्पर्य है कि इस ब्रह्माण्ड की हर चीज़ कुछ भी करने में ‪‎ईश्वर‬ की मोहताज है! मतलब 'सूर्य‬' रौशनी देने या ‪'पृथ्वी‬' जीवन देने में उसके हुक्म के मोहताज है, क्योंकि पॉवर सेंटर केवल एक ‎अल्लाह‬ है... इसका मतलब यह हुआ कि बाकी चीज़ें प्रशंसनीय तो हो सकती हैं परन्तु पूजनीय नहीं!

उदहारण के लिए अगर हम सूर्य की प्रशंसा करते हैं कि इसमें उसके बनाने वाले की प्रशंसा भी स्वत: ही निहित हो जाती है पर अगर हम यह सोच कर चलते हैं कि सूर्य स्वयं में एक ताकत है जिससे हमें कोई फायदा पहुँच सकता है तो यह उसकी पूजा तथा उसके पावर सेंटर और क्रिएटर की अवहेलना हुई! अगर 'सृजन' (Creation) की प्रशंसा में 'सर्जक' (Creator) की भूमिका का भी एहसास है तो यह सही है पर अगर 'सृजन' की प्रशंसा करते समय उसे 'सर्जक' की उपमा दे दी जाए तो यह मिथ्या बात हुई!

अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है कि उसने "ला'इलाहा इल्लल्लाह" की शिक्षा देने के लिए चार पूरी किताबें और कई पृष्ठ (सहीफ़े) उतारे। उसने दुनिया के हर कोने, हर समाज में अपने नेक बन्दों को मैसेंजर बनाकर भेजा जो उन्ही की भाषा में लोगों को समझाते थे और उस समझाने के एतबार से ही उस वक़्त के लोगों की ज़िन्दगी को उनका इम्तहान बनाया गया और उसी पर 'इंसाफ के दिन' पास या फेल पर फैसला होगा!

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'ॐ' और 'अल्लाह‬' में गज़ब की समानता



ॐ को अगर 90 डिग्री पर दाई ओर रोटेट किया जाए तो लफ्ज़ ‪#‎अल्लाह‬ बन जाता है!...





आपका क्या कहना है?

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तो क्या भाजपा प्रशंसकों को भारतीय होने पर शर्म आती थी?

मतलब क्या प्रधानमन्त्री महोदय यह कहना चाहते हैं कि भाजपा प्रशंसकों को इस सरकार के आने से पहले ख़ुद के भारतीय होने पर शर्म आती थी? 


अनेक कमियों के बावजूद हमारे देश की कंडीशंस हमेशा ऐसी रहीं हैं कि हम उसपर गर्व कर सकें! हालाँकि हम खुद भी देश में #Corruption, गरीबों / महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, सांप्रदायिक द्वेष / दंगे जैसी बहुत सी बातों के विरोधी हैं। हम आपस में अनेकों बातों पर लड़ते-भिड़ते भी हैं, मगर इसका मतलब यह नहीं कि खुद के भारतीय होने पर शर्म जैसी बातें करते फिरें और खासतौर पर विदेश में जाकर ऐसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करें जिससे देश शर्मसार हो! 

यह एक ऐसा बयान है जिसे देश के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित व्यक्ति तो क्या कोई आम नागरिक भी कभी नहीं देना चाहेगा! देश की संप्रभुता हमेशा से दलगत राजनीति से ऊपर रही है और भविष्य में भी हर हाल में रहनी चाहिए!


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी इस भारी भूल पर क्षमा मांगनी चाहिए!




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इस्लाम का सबसे मज़बूत अमल मुहब्बत है!



हज़रत मुहम्मद (स.) ने मालूम किया कि दीन का सबसे मज़बूत अमल क्या है?
आपके सहाबा (साथियों) ने जवाब दिया कि "नमाज़"
आपने कहा "नहीं"
सहाबा ने कहा "रोज़ा"
आपने कहा "नहीं"
सहाबा ने कहा "ज़कात"
आपने कहा "नहीं"
तो सबने कहा या रसूल्लाह (स.) फिर आप ही फरमाएं...
तब आप (स.) ने जवाब दिया कि "इस्लाम का सबसे मज़बूत अमल मुहब्बत है!"

('अहमद' व 'अबुदाऊद' )


हज़रत मुहम्मद (स.) ने मालूम किया कि इस्लाम का सबसे मज़बूत अमल क्या है?आपके सहाबा (साथियों) ने जवाब दिया कि "नमाज़"आपने कह...
Posted by Shah Nawaz on Monday, April 6, 2015

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किसी धार्मिक स्थल पर हमले का समर्थन घटिया सोच है?

विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन का तात्पर्य है कि चर्च तोड़कर हनुमान मूर्ति इसलिए रखी गई क्योंकि जिस गांव में चर्च पर हमला हुआ है उसमें या उसके आसपास कोई ईसाई नहीं रहता...


वैसे इन महाशय की पाकिस्तान में मंदिरों को तोड़ने वाली शर्मनाक घटनाओं पर क्या प्रतिक्रिया होती होगी?


यह कैसी सोच है कि धर्म स्थल जगह की उपलब्धता की जगह वहीँ बनाएं जाएं जहाँ उस समुदाय के लोग रहते हैं? और अगर कल को उक्त समुदाय के लोग किसी कारणवश पलायन कर जाएं तो क्या उनपर कब्ज़ा कर लिया जाना चाहिए या फिर तोड़-फोड़ जैसी शर्मनाक हरकत की जाए?

अगर दिल्ली की बात की जाए तो कई ऐसे ईसाई चर्च मैंने देखें हैं जहाँ आस-पास ईसाई नहीं रहते हैं, हो सकता है ऐसा जगह की उपलब्धता के कारण हो या कोई भी कारण हो, कोई कारण इस तरह तोड़फोड़ और मूर्ति स्थापित करने को जायज़ ठहरा भी नहीं सकता है।

हमारे देश में कानून है और हमें उसके हिसाब से ही चलना भी चाहिए, खासतौर विवादित जगहों पर टकराव की जगह प्रशासन को बीच में लाकर बातचीत होनी चाहिए।

वैसे भी बिना प्रशासन की अनुमति के तो वहां चर्च बना नहीं होगा। और अगर बिना अनुमति के बना हो, तब भी पहले क़ानूनी कदम उठाए जाने चाहिए थे।

हालाँकि मैं मानता हूँ कि उन्मादि भीड़ को नियंत्रित करना आसान नहीं है, पर मुद्दा यह है कि भीड़ ने वहां जो किया उसके विरोध किया जाना चाहिए या समर्थन।

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'चापलूस‬' व्यक्तित्व की दीमक होते हैं

जिस तरह ‪#‎दीमक‬ खामोशी के साथ हरे-भरे पेड़ को खोखला कर देती है, उसी तरह ‪#‎चापलूस‬ बड़े से बड़े व्यक्तित्व का नाश कर देते हैं।

देखा जाए तो ‪#‎आलोचक‬ ही असल ‪#‎शुभचिंतक‬ होते है!

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विकास में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए


देश और मुस्लिम समाज के लिए ज़रूरी है कि तरक़्क़ी की कोशिशो में महिलाओं की और भी ज़्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जाए और यह उनको उनके हुक़ूक़ से महरूम रखकर पॉसिबल नहीं हो सकता।


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साम्प्रदायिकता 'भ्रष्टाचार' की ढाल है


दिल्ली नतीजों के गूढ़ में निहित हैं कि जनता आज भी सांप्रदायिक ताकतों की घिनौनी राजनीति के खिलाफ है। देश का 'आम आदमी' यह जान चुका है कि 'साम्प्रदायिकता' और कुछ नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की ढाल है। 

सम्प्रयदाय अथवा ज़ात-पात की राजनीति करने वाले हमें इन मुद्दों में घुमाए रखना चाहते हैं, जिससे कि सत्ता सुख भोगने का उनका मक़सद आसानी से हल होता रहे और उनके द्वारा फैलाए जा रहे भ्रष्टाचार के जाल पर किसी का ध्यान ना जा पाए।

यह नतीजें राजनेताओं के लिए सन्देश है कि देश का युवा जागरूक हो रहा है, जो किसी भी कीमत पर खुद को बेवक़ूफ़ बनाने वालों को और बर्दाश्त नहीं करना चाहता!

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तेल का खेल

सरकार ने पिछले ढाई महीने में तीन बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई है, अगर यह एक्साइज ड्यूटी न बढ़ाई जाती तो पेट्रोल 5.75 रुपये और डीजल 4.50 रुपये और सस्ता होता।

हाल के महीनों में क्रूड ऑयल के मंदी के दौर में पहुंचने के कारण इसकी कीमत में लगभग 37 पर्सेंट गिरावट आई है, मगर देश में अभी तक पेट्रोल की कीमतों में करीब 11 प्रतिशत और डीजल में केवल 8 प्रतिशत की कमी ही की गई है।

और उसपर विज्ञापन तेल की कीमतों में राहत के दिए जा रहे हैं! :P


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इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक के खात्मे की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी मुसलामानों की ही है

उफ्फ्फ्फ़ कैसे हैवान हैं यह, जो बच्चों तक पर तरस नहीं खाते... यह लोग इंसानियत पर धब्बा हैं, आज दुनिया के सभी मुसलमानो को एक होकर इन हैवानों के खिलाफ उठ खड़े होने की ज़रूरत हैं! मुसलमानों पर ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी इसलिए भी है क्योकि यह लोग इस्लाम का नाम लेकर ऐसी हैवानियत फैलाते हैं... बेशक यह दुनिया के हर अमन पसंद का काम है कि दुनिया से हर मासूम पर ज़ुल्म करने वाले आतंकी का सफ़ाया हो!

हालाँकि दुनिया में अनेकों तरह की आतंकवादी हरकतें चल रही हैं, पर अगर बात इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक की करूँ तो इसे समाप्त करने के लिए पहल ख़ुद मुसलमानों को ही करनी पड़ेगी...

मैं यह हरगिज़ नहीं मानता कि ऐसी कोई भी हरक़त कोई मुसलमान कर सकता है, और असल बात यह है कि ऐसी हरकतें तो कोई इंसान कर ही नहीं सकता है! इंसानियत मर गई है इन लोगों के अंदर से, आज इस्लाम को इन लोगों की हैवानियत से महफूज़ करने की ईमानदार मेहनत की ज़रूरत है...

अल्लाह हम सब की हिफाज़त फरमाए, पूरी दुनिया के इंसानो की!

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